बंदर की कहानी : मोरल स्टोरी

बंदर की कहानी : मोरल स्टोरी

रामसिंग एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके पास ज्यादा पैसा नहीं था, इसलिए उन्होंने पैसे कमाने के लिए अपने पप्पूू नाम के बंदर को नचाया। वह और उसकी पत्नी रामबाई दोनों पप्पूू से बहुत प्यार करते थे। पप्पूू ही एकमात्र व्यक्ति था जिससे वे प्यार करते थे क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी। पप्पूू उसके लिए बहुत खास था क्योंकि वे दोनों उसकी देखभाल करते थे और सुनिश्चित करते थे कि वह खाना खाए और सो जाए। रामसिंग ने अपने लिये एक गेंद ले ली। पप्पूू अपने घर के बाहर गेंद से खेलता था।

वह खाने के लिए मिट्टी से बना एक कप, गर्म रहने के लिए कपड़े का एक टुकड़ा, सोने के लिए एक बैग और शेड में खेलने के लिए एक रस्सी का इस्तेमाल करता था। पप्पूू को ये चीज़ें बहुत पसंद थीं। जब तक उसके प्याले में कुछ न डाला जाए, उसने खाने से इंकार कर दिया। वह अपने टाट और कंबल से बहुत खुश था और उसे अपने शॉल और गद्दे की ज्यादा परवाह नहीं थी। वह हर दिन बहुत अच्छा समय बिताते थे। वह सुबह रोटी खाकर अपने मित्र मदारी के साथ तमाशा देखने जाते थे। वह वाकई चीजों की इतनी अच्छी नकल करने में माहिर था कि देखने वाले लोग आश्चर्यचकित हो जाते थे और अपनी नजरें उस पर से नहीं हटा पाते थे। वह लाठी थामे किसी बूढ़े की तरह धीरे-धीरे और सावधानी से चलता था। वह एक विशेष चटाई पर बैठते थे और अपने माथे पर एक टीका लगाते थे। फिर वह एक किताब पकड़ता और उसमें से जोर-जोर से पढ़ता।
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जिस तरह से दर्शक ने गाने को कॉपी करने के लिए ड्रम बजाया वह इतना अद्भुत था कि देखने वाले लोग बेहद उत्साहित और प्रभावित हुए। शो के बाद वह सभी को अलविदा कहते थे और कभी-कभी लोगों के पैर भी छूते थे और पैसे मांगते थे। पप्पूू के पास एक कटोरा था जो पैसों से भरा था। तभी कोई पप्पूू को अमरूद खाने को देता और काई उसके सामने टॉफियाँ उछाल देता। लड़कों को उसे देखना बहुत अच्छा लगता था और वे उसे और भी देखना चाहते थे। वे जल्दी-जल्दी अपने घरों से जाकर रोटियाँ लाते और उसे देते। आस-पड़ोस के लोगों को पप्पूू मनोरंजन करता हुआ लगा।

जब वह घर पर होता था तो या तो कोई आकर उसके साथ खेलता था या फिर फेरीवाले अपना सामान बेचते समय उसे कुछ दे देते थे। अगर कोई बिना कुछ दिए जाने की कोशिश भी करता तो पप्पूू उसके पैर पकड़कर उसे रोक देता। पप्पूू को सचमुच कुत्तों पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह उन्हें जाने नहीं देता था और अगर कोई पास आने की कोशिश करता तो वह उन्हें मारता था। ये एक और वजह है कि लोग उन्हें इतना पसंद करते थे

कभी-कभी दिन में जब रामबाई धूप में आराम करती तो पप्पूू उसके सिर से छोटे-छोटे जू उतार देता और वह उसके लिए गाना गाती। उसकी माँ जहाँ भी जाती थी, पप्पूू हमेशा वहाँ जाता था। वे एक-दूसरे से इतना प्यार करते थे, ऐसा लगता था जैसे एक माँ और उसके बेटे के बीच इससे अधिक प्यार हो ही नहीं सकता। एक दिन पप्पूू ने सोचा कि कहीं जाकर कुछ फल खा लिया जाए तो अच्छा रहेगा। हमें खाने के लिए फल तो मिलते ही थे, लेकिन हमें पेड़ों पर चढ़ने और शाखाओं पर कूदने में भी मज़ा आता था। हम कुछ फल खाएँगे और कुछ छोड़ भी देंगे। बंदर हमेशा मजाकिया होते हैं, और पप्पूू का स्वभाव उससे भी ज्यादा मजाकिया था। कोई लड़ाई या बहस नहीं हुई. उसने सोचा कि पेड़ों पर चढ़ना और उनसे फल खाना सामान्य बात है।

यहां तक ​​कि जो चीजें ऐसी प्रतीत होती हैं कि वे प्रकृति से संबंधित हैं, जैसे पानी, हवा और प्रकाश, वे भी लोगों से प्रभावित हो सकती हैं। इसका मतलब यह है कि इंसानों द्वारा बगीचों को भी बदला जा सकता है। दोपहर को जब रामसिंग तमाशा दिखाकर लौटा, तो पप्पूू एकाएक लम्बा हो गया। हालाँकि वह हमेशा पड़ोस में जाता रहता था, लेकिन किसी को पता नहीं चलता था कि वह कहीं और गया है। वह चलता रहा और कुछ टाइलों पर कूदता रहा और आख़िरकार एक बगीचे में पहुँच गया। मैंने देखा कि पेड़ों पर बहुत सारे फल लगे थे। वह पेड़ों पर लटके हुए आंवला, कटहल, लीची, आम और पपीता जैसे बहुत सारे स्वादिष्ट फलों को देखकर खुश हुआ। यह ऐसा है जैसे पेड़ उससे बात कर रहे हों और उसे अपने फल खाने के लिए आमंत्रित कर रहे हों। वह बिना किसी नियम या सीमा के जितना चाहे उतना खा सकता है। वह व्यक्ति तुरंत कूद गया और दीवार पर चढ़ गया जो दो क्षेत्रों को अलग करती है।

दूसरी छलांग के दौरान, वे पेड़ों के पास गए और कुछ आम और लीचियाँ खायीं। मैं वास्तव में खुश महसूस कर रहा था, इसलिए मैंने गुठलियों के छोटे-छोटे टुकड़े चारों ओर उछालना शुरू कर दिया। फिर पेड़ के बिल्कुल ऊपर चढ़ गया और शाखाओं को इधर-उधर घुमाने लगा। दोपहर को माली झपकी ले रहा था तभी उसे कुछ शोर सुनाई दिया। वह डर गया और उसने सोचा कि पप्पूू ही शोर मचा रहा है, इसलिए उसने उस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।
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या तो पत्थर उस पर नहीं लगीं या उसने उनसे बचने के लिए अपना सिर और शरीर हिलाया। कभी-कभी वह अपने दाँत निकालकर माली को डरा देता था। दूसरी बार, वह डरावना चेहरा बनाता और उसे काटने का नाटक करता। जो व्यक्ति बगीचे की देखभाल करता था वह खरपतवार से डरता था और उसकी जगह पत्थर ले आता था। बच्चों ने यह देखा और जय-जयकार करने लगे और शोर मचाने लगे

अरे बंदर, तुम्हारा चेहरा पूरा लाल है और तुम्हारे गाल फूले हुए लग रहे हैं। बंदर की दादी का निधन हो गया और मुछंदर नाम के एक अन्य बंदर के पैर में बहुत गंभीर चोट लगी। पप्पूू को इस व्यस्त जगह में बहुत मजा आ रहा था। वह केवल आधा फल खाता और फिर उसे नीचे गिरा देता। फिर लड़के उसे उठा लेते थे और उसकी जय-जयकार करते थे, उसे मंकी अंकल कहकर बुलाते थे और पूछते थे कि वह कहाँ रहता है। जब बगीचे की देखभाल करने वाले व्यक्ति ने देखा कि सभी लोग बहुत परेशान हैं और शांत नहीं हो पा रहे हैं, तो उन्होंने जाकर अपने मालिक को बताया। उन्होंने हज़रत पुलिस विभाग के लिए काम किया। जैसे ही उसने समस्या के बारे में सुना, उसने तुरंत इसे ठीक करने का एक तरीका ढूंढ लिया।

बंदर  बहादुर है और मेरे बगीचे में बहुत परेशानी पैदा कर रहा है। मैं ही वह हूं जो इस घर में रहने के लिए भुगतान करता हूं, लेकिन कुछ मूर्ख बंदर हैं जो मदद नहीं करते हैं। वे चीज़ों को कठिन बनाते हैं और लोग उनसे डरते हैं। क्या आप जानते हैं बंदर कैसा होता है? उन्होंने तुरंत बंदूक उठाई और बगीचे में चले गए। पप्पूू एक पेड़ को बहुत ज़ोर से हिला रहा था। तभी उसे गुस्सा आ गया और उसने उसी स्थान पर बंदूक का निशाना लगा दिया। बंदूक देखकर पप्पूू सचमुच डर गया। इससे पहले कभी किसी ने उस पर बंदूक तानकर हमला नहीं किया था। लड़के ने बंदूक की तेज़ आवाज़ सुनी और पक्षियों को घायल होते देखा। भले ही उसने इसे न देखा हो, फिर भी वह बंदूक से डरता रहेगा क्योंकि यह एक डरावनी चीज़ है।

जानवर स्वाभाविक रूप से अपने दुश्मनों से सावधान रहते हैं। पप्पूू के पैर सुन्न हो गए, इसलिए वह दूसरे पेड़ पर भी नहीं कूद सका। वह झुककर उसी डाल पर बैठ गया। उस आदमी को बंदर का दिखना पसंद आया और उसे उस पर दया आ गई। उसने किसी को बंदर को पकड़ने के लिए भेजा। माली सचमुच डरा हुआ था, लेकिन वह जानता था कि साहब बहुत क्रोधित होंगे। इसलिए, वह बिना किसी को देखे पेड़ पर चढ़ गया और रस्सी से बंधे हजरत बंदर को वापस ले आया। पप्पूू साहब बरामदे में एक खम्भे से चिपक गये थे। वह अब और नहीं हिल सकता था। करुण उसके पास रहा और सारा दिन उदास होकर रोता रहा। एक शाम एक नौकर ने पप्पूू को चने नाम की कोई चीज़ दी। पप्पूू को एहसास हुआ कि उसकी स्थिति बदल गई है और उसके पास जमीन पर कोई कंबल या बैग नहीं है। उसने चने भी नहीं खाए.

वह उदास हो रहा था क्योंकि उसे याद नहीं आ रहा था कि वह फल खाने कहाँ गया था। उसने सोचा कि वह फल बेचने वाले से कितना प्यार करता है, जो शायद इसलिए उसे ढूंढ रहा होगा क्योंकि वह गरीब है। माँ शायद मुझे भोजन और दूध से "पप्पूू-पप्पूू" कह रही है। ओह तेरी! तुम मुझे कहाँ लाये और कहाँ छोड़ गये? पप्पूू सारी रात जागता रहा और एक खंभे के चारों ओर चक्कर लगाता रहा। साहब का कुत्ता टॉमी भौंक-भौंक कर पप्पूू को डराता रहा। पप्पूू को कुत्ते पर इतना गुस्सा आ रहा था कि वह उसे मारना चाहता था, लेकिन कुत्ता दूर रहकर भौंकता रहा। रात भर रुकने के बाद साहब ने पप्पूू को कई बार मारा। पप्पूू रोया और चिल्लाया, जिससे मैं पूरी रात जागती रही। पप्पूू की आंख में चोट नहीं लगी. किद्दो, अगर तुमने आज फिर शोर मचाया तो मैं तुम्हें डरा दूंगा।

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इतना कहने के बाद वह चला गया और फिर शरारती लड़कों की बारी आई। घर के अंदर और बाहर दोनों तरफ से लड़कों का एक समूह इकट्ठा हो गया। पप्पूू के लिए कठिन समय था क्योंकि कुछ बच्चों ने उसका मज़ाक उड़ाया, कुछ ने उस पर पत्थर फेंके, और कुछ ने उसे स्वादिष्ट व्यंजन दिखाकर अपना काम करने की कोशिश की। उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था, और किसी को उस पर दया नहीं आई। उसने वह सब कुछ करके खुद को बचाने की कोशिश की जो वह कर सकता था, लेकिन फिर भी हार गया। एक लड़के का सम्मान किया गया और उसकी प्रशंसा की गई, लेकिन फिर उसे एक ऐसा उपहार मिला जिससे अन्य लड़के उसे और भी अधिक परेशान करने लगे। आज उसके सामने चना नाम का कोई भोजन नहीं था और यदि कुछ होता भी तो वह उसे खा नहीं पाता।

दुःख कुछ भी खाना नहीं चाहता था. शाम को मदारी साहब पता करके उनके घर आये। पप्पूू ने यह देखा तो बहुत अधीर हो गया, मानो जंजीर तोड़कर खम्भा गिरा देना चाहता हो। मदारी ने जाकर पप्पूू को गले से लगा लिया और साहब से बोला-साहब, गलती तो आदमी से भी होती है, जानवर है! तुम मुझे जो सज़ा देना चाहते हो दो, लेकिन मत दो। सरकार उस सहायक की तरह है जो यह सुनिश्चित करती है कि हमारे पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन हो। इसके बिना, हम बहुत भूखे होंगे और हमारे पास जीवित रहने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होगा। हम एक लड़के की तरह उसकी देखभाल कर रहे हैं और

उसके जाने के बाद से प्रभारी व्यक्ति ने खाना-पीना बंद कर दिया है। सरकार, कृपया दयालु और दयालु बनें। आपके शब्द सदैव सकारात्मक और उत्थानकारी हों। आपको उच्च पद पर पदोन्नत किया जा सकता है। आपके निर्णय निष्पक्ष एवं निष्पक्ष हों। याद रखें, आप शक्तिशाली और सशक्त हैं। किसी को भी तुम्हें नीचे गिराने मत दो। लेकिन उस आदमी ने दयालु होना नहीं सीखा। वह चिल्लाया और किसी और को गंदी बातें कही, जिससे उन्हें बुरा लगा। बंदर चला गया और बगीचे में गंदगी मचा दी और सभी फलों को बर्बाद कर दिया। अब आपको जाकर देखना होगा कि कितने फल खराब हुए

अगर लेना हो तो दस रुपये लाओ और मुझे देखो। यदि नहीं तो चुपचाप अपने रास्ते चले जाओ। या तो वह मरने तक यहीं बंधा रहेगा, या कोई निश्चित धनराशि देकर उसे ले जाएगा। इस बात से मदारी दुखी और दुखी रहता था। तुम्हारे पास दस रुपये कहाँ से आये? मैं रामबाई से मिलने गया और पूछा कि वह कैसा महसूस कर रही है। रामबाई का मानना ​​था कि दूसरों के प्रति दयालु होने से उसे बेहतर महसूस करने में मदद मिलेगी। उसने कहा - 'मैंने अभी देखा कि तुमने क्या किया! ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने इसे बहुत जोर से छड़ी से मारा हो। लोग कुछ विशेष और महत्वपूर्ण करने की बात कर रहे हैं, लेकिन जब वे एक निश्चित स्थान पर जाते हैं तो वे क्रोधित हो जाते हैं। मेरे साथ चलो और देखते हैं कि मैं उस व्यक्ति को भगा सकता हूं या नहीं।

उसने पप्पूू का सारा सामान एक पोटली में बाँधा और मदारी के साथ साहब के पास चली गयी। पप्पूू इतना उत्तेजित हो गया कि उसने जोर से छलांग लगायी और खम्भे को हिला दिया। रामबाई ने सरकार से कहा कि कृपया उन्हें दान के रूप में बंदर दे दें क्योंकि वे जरूरतमंद थे और मदद मांगने के लिए उनके दरवाजे पर आए थे। कुछ लोग सोचते हैं कि ऐसे लोगों को चीज़ें देना बुरा है जिन्हें मदद की ज़रूरत है। हम अलग-अलग देशों में जाते हैं और आपकी तरह ही गाने गाते हैं। सुनो - हमें एक जैसी चीज़ों की न तो परवाह है और न ही वे पसंद हैं। अच्छा काम करने पर भगवान आपको पुरस्कार देंगे। मैं नहीं जानता कि भगवान कौन है? मंदारिन - महाराज, किसी को माफ करना बहुत अच्छी और सम्मानजनक बात है। हमारे यहां लोग सोचते हैं कि सज़ा बहुत ज़रूरी है और इससे कोई बहुत ताकतवर दिखता है

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अरे बच्चे, प्रभारी नेता को हुजूर कहते हैं। यह सुनिश्चित करना उनका काम है कि चीजें निष्पक्ष हों। उन्हें फल चुराने के लिए दो लोगों को दंडित नहीं करना चाहिए - यह उचित नहीं है। निष्पक्ष होना ही एक नेता को महान बनाता है। हमें माफ करने और निष्पक्ष होने पर गर्व होना चाहिए, लेकिन हर चीज को निष्पक्ष बनाना हमारी जिम्मेदारी नहीं है। मौज-मस्ती करना हमारी जिम्मेदारी है. रामबाई ने कई तरकीबें आजमाईं, लेकिन जब अहंकार की मूर्ति दिखी तो उसकी एक भी चाल काम नहीं आई। वह दुखी हो गई और उसने मूर्ति से कहा कि वह इन चीज़ों को बंदर के पास रख दे क्योंकि इससे वे जीवित हो जाती हैं। किसी ने कहा कि उनके पास कूड़ा डालने की कोई जगह नहीं है और वे इस बात से दुखी हैं। टॉमी ने देखा कि जब पप्पूू नहीं बोलता, तो कुछ अजीब होता है - वह शेर बन जाता है और पप्पूू पर भौंकने लगता है। लेकिन पप्पूू ने शेर के कान पकड़ लिए और उसे इतना जोरदार थप्पड़ मारा कि उसे कुछ महत्वपूर्ण बात याद आ गई। सर ने चीख सुनी और कमरे से बाहर चले गये. उसने पप्पूू को कई बार मारा

नौकरों को आदेश दिया गया कि उन्हें इस अपराधी को तीन दिनों तक कुछ भी खिलाने की अनुमति न दें। आय दिन कुछ नए मैनेजर से बात करने के लिए एक सर्कस कंपनी के नियंत्रक के पास गया। उसने पप्पूू को बंधक बनाए हुए और रोने वाले चेहरे के साथ बैठे हुए देखा, और इसके बाद उसके पास गया और उसे पुकारा। पप्पूू ने खुशी से उछलकर उसकी टांगों में जकड़ लिया और उसे स्वागत करने लगा। मैनेजर समझ गया कि यह एक पालतू जानवर है। उसे अपने शो के लिए एक बंदर की जरूरत थी। उसने नियंत्रक से बातचीत की, सही मूल्य दिया और उसे अपने साथ ले गया। लेकिन पप्पूू ने जल्दी समझ लिया कि वहाँ पर उसे और बुरी स्थिति में फंसा दिया गया है। मैनेजर ने उसे बंदरों के पालक को सौंप दिया। पालक एक बहुत ही क्रूर और निर्दयी प्राणी था।

उसके पास और भी कई बंदर थे, जो सभी उसके नियंत्रण में थे और कठिनाइयों का सामना कर रहे थे। वह खुद ही उनके भोजन की सामग्री खा जाता था। अन्य बंदरों ने पप्पू का आगमन ध्यान नहीं दिया। उसके आने से एक बड़ी हलचल मच गई। यदि रखवाला उसे अलग नहीं करता तो सभी उसे नोचकर खा जाते। पप्पूू को अब नई कला सीखनी पड़ी। उसे पैर गाड़ी करनी पड़ी, दौड़ते घोड़ेे की पीठ पर खड़ा होना पड़ा, पतली रस्सी पर चलना इत्यादि जो सभी कठिनाईयों से भरी हुई थीं।

पप्पूू को इन सभी कौशलों को सीखने में बहुत कठिनाईयाँ आती थी। यदि वह थोड़ी भी गलती करता, तो उसे डंडे से पीठ पर मार पड़ती। इससे अधिक कठिनाईयाँ उसे उठानी पड़ती थी, क्योंकि उसे पूरे दिन एक बंद कमरे में बंद करके रखा जाता था, जहां कोई उसे नहीं देख सकता था। वहां तमाशा देखाने के बजाय उसे ये बड़ा कारावास और डंडों की सजा मिलती थी! इस तमाशे और उसके पहले तमाशे में बहुत अंतर था। वहां मदारी के खूबसूरत बातें, उसका प्यार और दुलारा होता था, जबकि यहां उसे सिर्फ कारावास और डंडों की मार मिलती थी! इसलिए उसे इन कौशलों को सीखने में और भी समय लगता था, क्योंकि वह अभी तक रामसिंग के पास भागने के विचार से अलग नहीं हुआ था। वह रोज़ इसके बारे में सोचता था कि कब मौका मिलेगा और वह निकल सकेगा, लेकिन वहां जानवरों पर नज़र रखी जाती थी।

वाह! बाहर की हवा तक पहुंचने का सपना भी नहीं था, भागने के बारे में तो बात ही कुछ और थी! सर्कस में काम करने वाले तो थे, लेकिन भोजन की खबर लेने वाला कोई भी नहीं था। पप्पूू तो बाद में साहब की कैद से छूट गया था, लेकिन इस कैद में उसे तीन महीने बिताने पड़े। उसके शरीर कमजोर हो गया था और उसे हमेशा चिंता सताती रहती थी, लेकिन भागने के लिए कोई स्थान नहीं था। चाहे वह चाहे न चाहे, उसे काम करना ही पड़ता था। साहब को पैसों से सब कुछ मिलता था, उसे जीना चाहे या मरना। फिर एक दिन, सर्कस के पंडाल में आग लग गई। सभी सर्कस के कर्मचारी जुआ खेलने, शराब पीने और लड़ाई-झगड़ा करने में व्यस्त थे। आग लगते ही, वहां की गैस की नली फट गई और हाहाकार मच गया। दर्शक भागने लगे और सर्कस के कर्मचारी अपनी चीजें निकालने में लग गए। पशुओं के बारे में कोई भी खबर नहीं थी। सर्कस में शेर, चीते, हाथी और रीछ जैसे भयंकर जानवरों का तमाशा हो रहा था। कुत्ते, घोड़े और बंदरों की संख्या उनसे भी अधिक थी। कंपनी अपने कर्मचारियों की जान को कुछ नहीं समझती थी, सिर्फ धन कमाने के लिए उन्हें इस खतरनाक तमाशे के लिए खोला गया था। आग लगते ही सभी जानवर चिल्लाते-चिल्लातेे भागने लगे।

पप्पूू ने भी भागते हुए देखा कि सर्कस का पंडाल जल रहा है या बच रहा है, लेकिन वह इसका पीछा नहीं किया। वह कूदते-फांदते सीधे अपने घर पहुंच गया, जहां रामसिंग रहता था, लेकिन द्वार बंद था। खपरैल पर चढ़कर उसने घर में प्रवेश किया, लेकिन किसी आदमी की उपस्थिति नहीं दिखाई दी। उस स्थान पर, जहां वह सोता था और जिसे रामबाई गोबर से ढककर साफ रखती थी, अब घास और पात की आवरण में छिपा हुआ था। लकड़ी, जिस पर वह कूदता था, दीमकों द्वारा खा जाई थी। मुहल्लेवाले ने उसे देखते ही पहचान लिया। शोर मच गया - "पप्पूू आ गया, पप्पूू आ गया!" उस दिन से पप्पूू हर रोज़ संध्या को उसी घर में आने लगा और अपने पुराने स्थान पर लेट जाता। वह दिनभर मुहल्ले में घूमता रहता था, कोई उसे कुछ दे देता तो वह खा लेता, लेकिन किसी की चीज़ छूने का कोई साधन नहीं था।

उसे अब भी आशा थी कि मेरा स्वामी यहां मुझसे अवश्य मिलेगा। रातों को उसकेकराहने की करुण ध्वनि सुनाई देती थी। उसकी दीनता पर देखनेवालों की आंखों से आंसू निकल पड़े थे। इस प्रकार कई महीने बीत गये। एक दिन पप्पूू गली में बैठा हुआ था, इतने में लड़कों का शोर सुनाई दिया। उसने देखा, एक बुढ़िया बिना कपड़े के , एक चीथड़ा कमर में लपेटे सिर के बाल छिटकाए, भूतनियों की तरह चली आ रही है, और कई लड़के उसके पीछे पत्थर फेंकते पगली नानी! पगली नानी! की हांक लगाते, तालियां बजाते चले जा रहे हैं। वह रह-रहकर रुक जाती है और लड़कों से कहती है - 'मैं पगली नानी नहीं हूं, मूझे पगली क्यों कहते हो?' आखिर बुढ़िया जमीन पर बैठ गई, और बोली - 'बताओ, मुझे पगली क्यों कहते हो?' उसे लड़कों पर लेशमात्र भी क्रोध न आता था। वह न रोती थी, न हंसती। पत्थर लग भी जाता तो चुप हो जाती थी। एक लड़के ने कहा - तू कपड़े क्यों नहीं पहनती? तू पागल नहीं तो और क्या है ? बुढ़िया - कपड़े जाड़े में सर्दी से बचने के लिए पहने जाते हैं। आजकल तो गर्मी है।

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लड़का - तुझे शर्म नहीं आती? बुढ़िया - शर्म किसे कहते हैं बेटा, इतने साधू-संन्यासी बिना कपड़ो के रहते हैं, उनको पत्थर से क्यों नहीं मारते? लड़का - वे तो मर्द हैं। बुढ़िया - क्या शर्म औरतों ही के लिए होती है, मर्दों को शर्म नहीं आनी चाहिए? लड़का - तुझे जो कोई कुछ दे देता है, उसे तू खा लेती है। तू पागल नहीं तो और क्या है? बुढ़िया - इसमें पागलपन की क्या बात है, बेटा? भूख लगती है, पेट भर लेती हूं। लड़का - तुझे कुछ विचार नहीं है? किसी के हाथ की चीज़ खाने से तुझे घिन नहीं आती? बुढ़िया - घिन किसे कहते हैं बेटा, मैं भूल गई। लड़का - सभी को घिन आती है, क्या बता दूं, घिन किसे कहते हैं। दूसरा लड़का - तू पैसे क्यों हाथ से फेंक देती है? कोई कपड़े देता है तो क्यों छोड़कर चल देती है? पगली नानी नहीं तो क्या है? बुढ़िया - पैसे, कपड़े लेकर क्या करूं बेटा? लड़का - और लोग क्या करते हैं? पैसे-रुपये का लालच सभी को होता है। बुढ़िया - लालच किसे कहते हैं बेटा, मैं भूल गई। लड़का - इसी से तुझे पगली नानी कहते हैं। तुझे न लोभ है, घिन है, न विचार है, न लाज है। ऐसे ही को पागल कहते हैं।

बुढ़िया - तो यही कहती हूँ, मैं पागल हूँ। लड़का - क्यों तुम्हें क्रोध नहीं आता? बुढ़िया - मुझे नहीं पता बेटा। मुझे क्रोध नहीं आता है। क्या किसी को क्रोध आता है? मैं भूल गई हूँ। कई लड़के ने इस पर 'पागली, पागली' की चीखें लगाईं और बुढ़िया वहीं शांतिपूर्वक आगे बढ़ी। जब वह पास आईं तो पप्पूू ने उसे पहचान लिया। वह मेरी बुढ़िया है। उसने दौड़कर उसके पैरों के आसपास लिपट गया। बुढ़िया चौंक गई जब उसने पप्पूू को देखा, वह उसे पहचान गई। उसने उसे अपनी छाती से लगा लिया। पप्पूू को गोद में लेते ही बुढ़िया को अनुभव हुआ कि मैं बिना कपड़े की हूँ। शर्म के मारे वह खड़ी नहीं रह सकी। वह बैठकर एक लड़के से कही - बेटा, क्या तुम मुझे कुछ पहनाने के लिए दोगे? लड़का - क्या तुम्हें लाज नहीं आती? बुढ़िया - नहीं बेटा, अब मुझे आ रही है। मैं नहीं जानती क्या हो गया था। लड़के फिर से 'पागली, पागली' का शोर मचाने लगे। इस पर उसने पत्थर फेंककर लड़कों को मारना शुरू किया। उनके पीछे दौड़ी। एक लड़का ने पूछा - अभी तो तुझे क्रोध नहीं आता था, अब क्यों आ रहा है? बुढ़िया - क्या पता क्यों, अब मुझे क्रोध आ रहा है। तब किसी ने उसे पगली कहा तो वह बंदर से कटवा देगी। एक लड़का दौड़कर एक फटे हुए कपड़े लाया। बुढ़िया ने उस कपड़े को पहन लिया। अपने बाल समेट लिए।
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उसके मुख पर जो एक अमानुष आभा थी, उसकी जगह चिन्ता का पीलापन दिखाई देने लगा। वह रो-रोकर पप्पूू से कहने लगी - बेटा, तुम कहां चले गए थे। इतने दिन हो गए हमारी सुध न ली। तुम्हारी मदारी तुम्हारे ही वियोग में परलोक सिधारा, मैं भिक्षा मांगकर अपना पेट पालने लगी, घर-द्वार तहस-नहस हो गया। तुम थे तो खाने की, पहनने की, गहने की, घर की इच्छा थी, तुम्हारे जाते सब इच्छाएं लुप्त हो गईं। अकेली भूख तो सताती थी, पर संसार में और किसी की चिन्ता न थी। तुम्हारा मदारी मरा, पर आंखों में आंसू न आए। वह खाट पर पड़ा कराहता था और मेरा कलेजा ऐसा पत्थर का हो गया था कि उसकी दवा-दारू की कौन कहे, उसके पास खड़ी तक न होती थी।

बुढ़िया ने सोचा - यह मेरा कौन है? अब आज वे सब बातें और मेरी वही हालत याद आती है, तो यही कहना पड़ता है कि मैं सचमुच पागल हो गई थी, और लड़कों का मुझे पागल नानी कहकर चिढ़ाना ठीक था। इसके बाद बुढ़िया पप्पूू को साथ लेकर शहर के बाहर एक बगीचे में गई, जहां एक पेड़ के नीचे रहती थी। वहां थोड़ी-सी पुआल हुई थी। वहां कोई और मनुष्य का आवास नहीं था। अब से पप्पूू बुढ़िया के पास रहने लगा। वह सुबह होते ही घर से निकलता और नकल करके, भीख मांगकर बुढ़िया के खाने-भर को नाज या रोटियां लाता। अगर पुत्र होता तो वह इतनी प्रेम से माता की सेवा नहीं करता। उसकी नकलों को देखकर लोग उसे पैसे भी देते थे। बुढ़िया उन पैसों से खाने की चीजें बाजार से लाती थी। लोग बुढ़िया के प्रति उस बंदर जैसे प्रेम को देखकर चकित हो जाते और कहते थे कि यह बंदर नहीं, कोई देवता है।

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