समास की परिभाषा क्या है?
'समास-प्रक्रिया' का अर्थ होता है उन शब्दों या पदों की प्रक्रिया जिससे एक नया शब्द या पद 'समस्त पद' बनता है, जिसमें दो अलग-अलग शब्दों का अर्थ और उपयोग समाहित होता है।
समास की विशेषताएं क्या हैं?
समास में दो पदों का जोड़ होता है और उनका मिलने से एक नया पद बनता है। इस प्रक्रिया में दोनों पदों के बीच की विभक्ति का लोप हो जाता है। समास में कभी-कभी पहला पद प्रधान होता है और कभी दूसरा पद प्रधान होता है, जबकि कभी-कभी दोनों पद प्रधान होते हैं। संस्कृत में समास होने पर संधि का उपयोग अवश्य होता है, लेकिन हिंदी में ऐसा कोई नियम नहीं है।
समास-विग्रह क्या है?
समस्त पद के दोनों पदों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को समास-विग्रह कहा जाता है। इस प्रक्रिया में, दोनों पदों के बीच के विभक्ति या कारकीय-चिह्नों को भी जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के रूप में, 'डाकगाड़ी' समास-विग्रह का एक उदाहरण है, जिसमें दोनों पदों के बीच के कारकीय-चिह्न 'के लिए' को फिर से जोड़ा गया है, जैसे 'डाक के लिए गाड़ी', जिससे 'डाकगाड़ी' का अर्थ होता है 'डाक के लिए गाड़ी'।
संधि तथा समास में अंतर क्या है?
समास और संधि में काफी अंतर होता है। संधि का संबंध किसी शब्द की दो ध्वनियों के बीच जोड़ से होता है, जिसमें पहली, दूसरी या दोनों ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता है। वह ध्वनियों का संधिविच्छेद होता है जिससे वे शब्द एक होते हैं। वहाँ तुलनात्मक रूप से, समास-प्रक्रिया दो शब्दों के जोड़ से नया शब्द बनाती है, जिसमें दोनों शब्दों का अर्थ मिलता है और वे एक नए शब्द के रूप में रचे जाते हैं।
समास के भेद क्या हैं?- द्वन्द्व समास
- अव्ययीभाव समास
- तत्पुरुष समास
- बहुव्रीहि समास
- कर्मधारय समास
- द्विगु समास।
द्वंद्व समास क्या है?
द्वंद्व समास में कोई भी पद गौण नहीं होता, बल्कि दोनों ही पद प्रधान होते हैं। समस्तपद बनाते समय दोनों पदों को जोड़ने वाले समुच्चयबोधक अव्ययों- ‘और’, ‘तथा’, ‘या’ आदि को हटा दिया जाता है और विग्रह करते समय इनको पुनः दोनों पदों के बीच जोड़ दिया जाता है; उदाहरण के तौर पर, राम-श्याम का विग्रह होगा- राम और श्याम।
| समस्तपद | विग्रह |
|---|---|
| यशप्राप्त | यश को प्राप्त |
| अकाल-पीड़ित | अकाल से पीड़ित |
| असफल | जो सफल न हो |
| दोपहर | दो पहरों का समाहार |
| दाल-चावल | दाल और चावल |
| देशवासी | देश का वासी |
| पीतांबर | पीत (पीला) है जो अंबर (वस्त्र) |
| दशानन | दस हैं आनन जिसके |
अव्ययीभाव समास क्या है?
जब एक समास का पहला पद अव्यय (अविकारी शब्द) होता है, तो उसे अव्ययीभाव समास कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर, 'यथासमय' समास में 'यथा' और 'समय' शब्दों का योग होता है। यहाँ पर 'यथा' अव्यय है और इसका विग्रह होता है 'समय के अनुसार'। इसी प्रकार के अव्ययीभाव समास के अन्य उदाहरण हैं।
| समस्तपद | अव्यय | विग्रह |
|---|---|---|
| आजीवन | आ | जीवन भर |
| यथोचित | यथा | जितना उचित हो |
| यथाशक्ति | यथा | शक्ति के अनुसार |
| भरपूर | भर | पूरा भरा हुआ |
| आमरण | आ | मरण तक |
| बेमिसाल | बे | जिसकी मिसाल न हो |
| बेमौक | बे | बिना मौके के |
| प्रतिदिन | प्रति | दिन-दिन/हर दिन |
कर्मधारय समास क्या है?
कर्मधारय समास में दोनों पदों के बीच दो तरह के संबंध हो सकते हैं - विशेषण-विशेष्य और उपमेय-उपमान। वास्तव में, उपमान भी उपमेय की विशेषता का वर्णन करने का कार्य करता है। कर्मधारय समास जो विशेषण-विशेष्य संबंध के साथ होते हैं, उनके उदाहरण इस प्रकार होते हैं:
| विशेषण | विशेष्य | समस्तपद | विग्रह |
|---|---|---|---|
| नील | गाय | नीलगाय | नीली है जो गाय |
| महा | आत्मा | महात्मा | महान है जो आत्मा |
| भला | मानस | भलामानस | भला है जो मानस |
| महा | देव | महादेव | महान है जो देव |
| पर | नारी | परनारी | पराई है जो नारी |
| उत्तम | पुरुष | पुरुषोत्तम | उत्तम है जो पुरुष |
द्विगु समास क्या है?
द्विगु समास भी तत्पुरुष समास का एक उपप्रकार है, जिसमें पूर्वपद गौण और उत्तरपद प्रधान होता है। इस समास में पूर्वपद संख्यावाची विशेषण होता है, जबकि कर्मधारय समास में पूर्वपद अन्य किसी भी विशेषण का हो सकता है।
द्विगु समास और कर्मधारय समास का सबसे बड़ा अंतर यह है कि द्विगु समास में उत्तरपद एक समूह का बोध कराता है। अगर विग्रह करते समय उत्तरपद के साथ समूह या समाहार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया हो, तो पूर्वपद संख्यावाची होते हुए भी इसे 'कर्मधारय समास' कहा जाएगा। द्विगु समास के उदाहरण इस प्रकार हैं:
| समस्तपद | समास-विग्रह |
| दुराहा | दो राहों का समाहार |
| तिरंगा | तीन रंगों का समाहार |
| पंचवटी | पाँच वट वृक्षों का समूह |
| नवग्रह | नौ ग्रहों का समाहार |
| नवरत्न | नव रत्नों का समाहार |
| पंचमुखी | पाँच मुखों का समाहार |
| त्रिफला | तीन फलों का समाहार |
बहुव्रीहि समास क्या है?
बहुव्रीहि समास वह समास है जिसमें दोनों पद गौण होते हैं। इस समास में न तो पूर्वपद प्रधान होता है और न ही उत्तरपद। वास्तव में, इसके दोनों पदों का संयोग किसी तीसरे बाहरी पद के साथ होता है, और यह तीसरा पद ही प्रधान होता है।
उदाहरण के लिए, त्रिलोचन शब्द की रचना पर ध्यान दीजिए। यह शब्द ‘त्रि’ और ‘लोचन’ दोनों पदों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'तीन नेत्र'। यदि इस शब्द का विग्रह 'तीन लोचनों का समाहार' किया जाए, तो यह द्विगु समास का उदाहरण होगा। अगर इसे 'त्रि लोचन' विग्रहित किया जाए, तो यह कर्मधारय समास का उदाहरण होगा।
अगर त्रिलोचन शब्द का विग्रह 'तीन हैं नेत्र' किया जाए, जिसका अर्थ है 'महादेव', तो यह उदाहरण बहुव्रीहि समास का हो जाएगा। इस विग्रह में 'त्रि' और 'लोचन' दोनों पद एक साथ मिलकर तीसरे पद 'महादेव' की विशेषता बता रहे हैं।
| समस्तपद | विग्रह | प्रधान पद |
|---|---|---|
| तिरंगा | तीन रंग हैं जिसके | भारतीय राष्ट्रध्वज |
| गजानन | गज के समान आनन है जिसका | गणेश |
| घनश्याम | घन के समान श्याम (काले) हैं जो | कृष्ण |
| चतुरानन | विष को धारण करता है जो | ब्रह्मा |
| गिरिधर | गिरि को धारण किया है जिसने | श्री कृष्ण |
| सुलोचना | सुंदर लोचन हैं जिसके | विशेष स्त्री |
तत्पुरुष समास क्या है?
तत्पुरुष समास वह समास है जिसमें समस्तपद में पूर्वपद गौण और उत्तरपद प्रधान होता है। इस समास में पूर्वपद विशेषण होता है, और उत्तरपद विशेष्य होने के कारण प्रधान होता है। तत्पुरुष समास के विग्रह के समय समस्त कारकों के कारकीय-चिह्न जो समास करते समय दिया गया था, उन्हें पुनः जोड़ा जाता है। उदाहरण सम्मुख रूप से पूर्वपद 'सम्मुख' का संकेतिक अर्थ होता है और उत्तरपद 'रूप' का संकेतिक अर्थ होता है।
| समस्तपद | पूर्वपद (गौण) | कारकीय-चिह्न | उत्तरपद (प्रधान) |
|---|---|---|---|
| युद्धक्षेत्र | युद्ध | का | क्षेत्र |
| गुरुदक्षिणा | गुरु | के लिए | दक्षिणा |
| यशप्राप्त | यश | को | प्राप्त |
| कुलश्रेष्ठ | कुल | में | श्रेष्ठ |
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